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Wednesday, February 4, 2009

What is NRI/NRO Account : क्या है एनआरआई/एनआरओ अकाउंट?

एनआरई/एनआरओ अकाउंट 

सरकार प्रवासी भारतीयों यानी एनआरआई को विदेश से यहां रुपया-पैसा भेजने के लिए खाता खोलने की सहूलियत देती है। इनमें एनआरई और एनआरओ एकाउंट सबसे लोकप्रिय हैं। 


आइए इन एनआरआई खातों के बारे में विस्तार से जानते हैं। एनआरई (नॉन रेजिडेंट एक्सटर्नल) खाते विदेश में कमाई रकम भारत भेजने में एनआरआई के खासे मददगार साबित हैं। ये खाते चालू, बचत या सावधि जमा खाते हो सकते हैं। ऐसे खाते को खाताधारक के अलावा निवासी भारतीय भी चला सकता है। निवासी भारतीय देश में स्थानीय मुदा में पैसा जमा कर सकता है। लेकिन इसके लिए उसके पास पावर ऑफ अटॉर्नी होना जरूरी है। 


एनआरओ (नॉन रेजिडेंट ऑर्डिनरी) खाता खोलने पर खाताधारक को देश-विदेश दोनों में कमाई गई रकम जमा करने की सुविधा मिलती है। एनआरओ खाता भी एनआरई की तरह चालू, बचत या सावधि जमा खाता हो सकता है। लेकिन इसके लिए संयुक्त खाताधारक का भारतीय निवासी होना जरूरी है। इस खाते में विदेशी मुद्रा में हुई कमाई, प्रॉपर बैंकिंग चैनल या एनआरई खाते से हासिल रेमिटेंस या भारत से हासिल पुराना बकाया जमा किया जा सकता है। इस खाते में जमा हुई रकम का इस्तेमाल भारत में भुगतान या निवेश में ही किया जा सकता है। 


एनआरई या एनआरओ खाता कैसे खोला जा सकता है? 

दोनों खाते खोलने का एक ही तरीका है। इसके लिए एनआरआई को किसी अधिकृत बैंक में आवेदन करना होगा। इसके बाद उन्हें बिजली, पानी, टेलिफोन जैसे बिल, ड्राइविंग लाइसेंस, रेजिडेंट परमिट, प्राप्त किराया, पासपोर्ट, विदेशी या भारतीय बैंक के स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज जमा कराने होंगे। साथ ही इसमें फॉरेक्स रेमिटेंस या एनआरई खाते से ट्रांसफर के जरिए न्यूनतम राशि जमा कराना जरूरी है। 


एनआरई या एनआरओ खातों में क्या अंतर है? 

एनआरई खाता विदेश से हासिल कमाई को जमा कराने के लिए होता है। एनआरओ में भारत में हुई कमाई जमा की जा सकती है। एनआरई में सिर्फ एनआरआई संयुक्त खाताधारक हो सकते हैं। एनआरओ में संयुक्त खाताधारक निवासी या अनिवासी भारतीय हो सकता है। एनआरई खाते में जमा रकम एनआरओ में ट्रांसफर की जा सकती है लेकिन एनआरओ से एनआरई में फंड ट्रांसफर नहीं हो सकता। 


एनआरई से समूचे मूलधन की निकासी की जा सकती है लेकिन एनआरओ में यह संभव नहीं। एनआरओ में जमा मूलधन का इस्तेमाल सिर्फ स्थानीय भुगतान में हो सकता है। लेकिन दोनों खातों में जमा रकम पर मिले ब्याज को खाताधारक कहीं भी ले जाने को आजाद है। एनआरओ खाते से सालभर में 10 लाख डॉलर की निकासी की जा सकती है। एनआरओ खाते में जमा रकम पर ब्याज भारत में करयोग्य है लेकिन एनआरई खाते के साथ ऐसा कुछ नहीं है। 


एनआरई खाते का क्या नफा और नुकसान है? 

इस खाते में जमा रकम पर मिलने वाला ब्याज भारत में करमुक्त होता है। खाते में बची रकम पर संपत्ति कर नहीं लगता। इस खाते की रकम से खरीदे उपहार पर भी कर नहीं लगता। इस खाते का सबसे बड़ा नुकसान करेंसी रिस्क यानी विनिमय दर से जुड़ा जोखिम है। इसमें जमा रकम पर एनआरओ खाते के मुकाबले कम ब्याज मिलता है।

Monday, January 26, 2009

एमआईपी के जरिये कम जोखिम के साथ इक्विटी में निवेश

ज्यादा पुरानी बात नहीं जब इक्विटी बाजार आसमान छू रहे थे और छोटे निवेशक शेयर बाजार से गजब का मुनाफा बटोर रहे थे। लेकिन 2008 में बाजार में जो तबाही का मंजर दिखा , उसने हर उस बचत उत्पाद पर चोट की , जिसमें इक्विटी का जरा सा भी अंश था। इस तूफान का मंथली इनकम प्लान (एमआईपी) पर भी असर पड़ा। 

एमआईपी ने सांकेतिक और वास्तविक पैमाने , दोनों की दृष्टि से नकारात्मक रिटर्न दिया है लेकिन बाजार के जानकारों का कहना है कि इन पर निवेश विकल्प के तौर पर एक बार फिर विचार किया जा सकता है। 

क्या होता है एमआईपी ? 

इस फंड को निवेशक को नियमित आमदनी मुहैया कराने के उद्देश्य के साथ पेश किया गया था। अगर डिविडेंड से कमाई होती है तो उसे मासिक , तिमाही या छमाही आधार पर बांट दिया जाता है। नियमित आमदनी से जुड़ा लक्ष्य तब पूरा किया जा सकता है , जब संपत्ति का कम से कम 75 फीसदी हिस्सा बढ़िया गुणवत्ता वाले फिक्स्ड इनकम उत्पादों में लगाया जाए और शेष इक्विटी में। 
कम जोखिम लेकर पैसा बनाने वाले फंड संपत्ति के 10 फीसदी हिस्से को इक्विटी में लगाते हैं। 

किसे करना चाहिए निवेश ? 

एमआईपी रिटायर्ड या रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके लोगों के लिए निवेश का बेहतर जरिया है। यह उत्पाद उन लोगों की मुश्किल दूर कर सकता है जो सुरक्षित माध्यमों में निवेश करना चाहते हैं और साथ ही इक्विटी का स्वाद भी चखना चाहते हैं। 

फंड का जोखिम से जुड़ा प्रोफाइल इसे इनकम और बैलेंस्ड फंड के बीच लाकर खड़ा कर देता है और यह उन निवेशकों को आकर्षित करते हैं ,जिनमें जोखिम सहने की क्षमता कम है। जो लोग खतरा लिए बगैर निवेश करना चाहते हैं और बाजार में बढ़त के दौरान उसका कुछ फायदा उठाना बेहतर समझते हैं , वे एमआईपी के जरिए निवेश कर सकते हैं।

Source: ET Hindi

Double Benefit on HUF Accounts : एचयूएफ खातों पर लें दोहरा लाभ


क्या आप उन लोगों में शुमार हैं, जिन्हें बेहतर एकाउंटिंग और कर बचाने के प्रावधानों के उद्देश्य के लिए अपनी पहचान को अलग कर देखने के तरीकों की तलाश रहती है? अगर ऐसा है तो आप उस वक्त से कुछ अंदाजा ले सकते हैं, जब लोग संयुक्त परिवारों में रहते थे और संयुक्त आमदनी बांटते थे। अगर आपने हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) खाता खोला है तो आय कर बचाने के लिए भी आप इसी अवधारणा से मदद ले सकते हैं। 

वास्तव में एचयूएफ अधिनियम के प्रावधानों के तहत आने वाले इस खाते से आप अपने भाई या पिता की लग्जरी कार चलाने का लुत्फ भी ले सकते हैं और अपने कारोबार में डेप्रीसिएशन क्लेम कर कुछ कर भी बचा सकते हैं। इसके लिए केवल एक बात की जरूरत होती है, इस अधिनियम के ब्योरे और टैक्स बचाने में उसके संबंध की जानकारी होना। 

फ्लैक्सी-ऑप्शन 

यूं तो एचयूएफ, हिंदू अविभाजित परिवार को कहा जाता है लेकिन इस टर्म के मायने व्यापक हैं। इसकी परिधि में केवल हिंदू परिवार ही नहीं आते बल्कि जैन, बौद्ध और सिख भी एचयूएफ बना सकते हैं। आम तौर पर एचयूएफ में कम से कम दो सदस्य शामिल होते हैं जिनमें से एक पुरुष होता है और यह एक ही पूर्वज से सीधे तौर पर जुड़े होने चाहिए। लेकिन आप छोटे विभाजित परिवार भी एक पुरुष सदस्य के साथ एचयूएफ बना सकते हैं। 

उच्चतम न्यायालय के मुताबिक, अंतिम पुरुष सदस्य के निधन के बाद ही एचयूएफ में केवल महिला सदस्य बच सकती है। एचयूएफ में आगे जाकर पत्नियां और परिवार की अविवाहित बेटियां भी शामिल हो सकती हैं। एचयूएफ में परिवार के सबसे वरिष्ठ सदस्य को कर्ता (मुखिया) के नाम से जाना जाता है। को-पार्सनर पुरुष होते हैं, जबकि महिलाएं सदस्य होती हैं। 

आम तौर पर कर्ता एचयूएफ की संपत्ति का प्रबंधन करता है। को-पार्सनर के पास विभाजन का अधिकार होता है, जो आम तौर पर एचयूएफ की संपत्तियां बांटने पर होता है। विभाजन की सूरत में सदस्यों को केवल रखरखाव मिलता है। एचयूएफ की संपत्ति में सदस्यों/कर्ता की ओर से दिए गए तोहफे या वसीयत में मिली जायदाद शामिल होती है। 

कर बचाने में मददगार 

आय कर अधिनियम के मुताबिक एचयूएफ एक अलग इकाई होती है और उसे व्यक्ति विशेष की तरह वही कर छूट मिलती है। केपीएमजी के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर विकास वसल ने कहा, 'यह स्लैब रेट और 80सी के तहत मिलने वाली कर छूट के योग्य होती है।' 1.5 लाख रुपए तक की आमदनी एचयूएफ के लिए कर मुक्त होती है और यह कारोबारी जायदाद, पूंजीगत लाभ या दूसरे स्त्रोतों से आने वाली आय का पैसा हो सकता है लेकिन इसमें तनख्वाह शामिल नहीं होती। 

एचयूएफ बनाकर कर छूट दो बार क्लेम की जा सकती है, ऐसे में कर बचाने के मोर्चे पर यह काफी फायदेमंद सौदा है। मसलन, अगर किसी व्यक्ति की सालाना आय 3 लाख रुपए है और उसने कर बचाने के लिए कोई निवेश नहीं किया है तो उसे 15,000 रुपए बतौर कर चुकाना होगा। लेकिन अगर यह व्यक्ति एचयूएफ का सदस्य है और कर के दायरे में आने वाली आधी रकम एचयूएफ के हाथों में जा रही है जबकि आधी उसके हाथ में तो उसे कोई टैक्स नहीं चुकाना होगा क्योंकि 1.5 लाख रुपए तक आमदनी पर कोई कर नहीं बनता। 

दूसरे फायदे 

पूर्वजों की वसीयत या फिर सदस्यों की भागीदारी से मिली कुछ संपत्ति के साथ एक बार एचयूएफ बन जाए, उसके बाद कर्ज लेकर और कारोबार के लिए जायदाद का इस्तेमाल कर उसकी संपत्ति का आधार बढ़ाया जा सकता है। एचयूएफ की कमाई में शामिल आमदनी पर केवल उसी के आधार पर टैक्स लगेगा और उसे किसी व्यक्ति विशेष की आय से जोड़कर नहीं देखा जाएगा। 

अगर कारोबार नाकाम होता है तो भी देनदारी सदस्यों की नहीं बनेगी। अर्न्स्ट एंड यंग में पार्टनर सोनू अय्यर के अनुसार एचयूएफ की देनदारी उसकी संपत्तियों तक सीमित है। इसलिए व्यक्तिगत क्षमता पर किसी भी सदस्य पर कोई देनदारी नहीं बनेगी। 

याद रखिए 

एचयूएफ का गठन पूरे परिवार की बेहतरी के लिए किया जाता है और इसलिए किसी भी कारोबारी फैसले पर सभी सदस्यों की राय शामिल होना जरूरी है। हर व्यक्ति को एचयूएफ की लंबी अवधि की संभावनाओं पर गौर करना चाहिए। 

आईट्रस्ट फाइनेंशियल एडवाइजर्स के को-फाउंडर धुव अग्रवाल ने कहा कि एचयूएफ कर छूट का फायदा देता है लेकिन आपको यह याद रखना चाहिए कि एचयूएफ के पूरी तरह विभाजित होने तक परिवार की आमदनी को एचयूएफ की आय के तौर पर आंका जाएगा। इसके अलावा हर सदस्य एचयूएफ की संपत्ति का मालिक होता है, ऐसे में उन्हें व्यक्तिगत हितों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

Sourse : ET Hindi

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